*ग्राम - देवरीकला हाई सेकंडरी स्कूल के सामने राइस मिल में संत रामपाल जी महाराज जी के सान्निध्य में एक दिवसीय आध्यात्मिक सत्संग का आयोजन प्रोजेक्टर के माध्यम से रखा गया है।*
ब्लाक कसडोल।
कबीर,हरि सेवा युग चार है, गुरु सेवा पल एक।
तासु पटंतर ना तुलै संतन किया विवेक।।
जिसमें इस सत्संग में बताया गया।पवित्र श्रीमद्भगवत गीता जी में सृष्टि रचना का प्रमाण इसी का प्रमाण पवित्र गीता जी अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 तक है। ब्रह्म (काल) कह सह रहा है कि प्रकृति (दुर्गा) तो मेरी पत्नी है, में ब्रह्म (काल) इसका पति हूँ। हम दोनों के संयोग सर्व प्राणियों सहित तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण - विष्णु जी, तमगुण - शिवजी) की उत्पत्ति हुई है। मैं (ब्रह्ना) सर्व प्राणियों का पिता हूँ तथा प्रकृति (दुर्गा) इनकी माता है। मैं नों देवा इसके उदर में वीज स्थापना करता हूँ जिससे सर्व प्राणियों की उत्पत्ति होती है। प्रकृति (दुर्गा) नहीं है। से उत्पन्न तीनों गुण (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) जीव को कर्म आधार प्रकृति से शरीर में बांधते हैं। यही प्रमाण अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तथा 16, 17 में भी है।गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 1ऊर्ध्वमूलम्, अधःशाखम्, अश्वत्थम्, प्राहुः, अव्ययम्,
छन्दांसि, यस्य, पर्णानि, यः, तम्, वेद, सः, वेदवित् ।।अनुवाद : (ऊर्ध्वमूलम्) ऊपर को पूर्ण परमात्मा आदि पुरुष परमेश्वर रूपी जड़ जो से लि वाला (अधःशाखम्) नीचे को तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु व तमगुण शिव या (तामस रूपी शाखा वाला (अव्ययम्) अविनाशी (अश्वत्थम्) विस्तारित पीपल का वृक्ष है. (यस्य) नियमानुस जिसके (छन्दांसि) जैसे वेद में छन्द है ऐसे संसार रूपी वृक्ष के भी विभाग छोटे-छोटे हम्) मैं हिस्से टहनियों व (पर्णानि) पत्ते (प्राहुः) कहे हैं (तम्) उस संसार रूप वृक्ष को (यः) जो (वेद) इसे विस्तार से जानता है (सः) वह (वेदवित्) पूर्ण ज्ञानी अर्थात् तत्त्वदर्शी है।वर्तमान में संसार रूपी उल्टे लटके वृक्ष की विस्तृत जानकारी संत रामपाल जी महाराज जी ने बताए हैं।इस सत्संग में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया गया।













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