डिजिटल तनाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है—समय रहते संतुलन जरूरी।

— मिथलेश रत्नाकर, साइकोलॉजिस्ट

बलौदाबाजार | छत्तीसगढ़  डिजिटल युग ने युवाओं के जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ मानसिक तनाव की एक नई चुनौती भी सामने आई है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन पढ़ाई और करियर की प्रतिस्पर्धा ने युवाओं को हर समय “ऑनलाइन” रहने के दबाव में डाल दिया है। विशेषज्ञ इसे डिजिटल तनाव मानते हैं, जो धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।

हर समय जुड़े रहने की मजबूरी

आज का युवा बार-बार मोबाइल देखने की आदत से परेशान है। नोटिफिकेशन बंद होते ही बेचैनी बढ़ जाती है। मनोविज्ञान में इसे FOMO (Fear of Missing Out) कहा जाता है—यानी कुछ छूट जाने का डर। यही डर नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की समस्या पैदा करता है।

सोशल मीडिया और तुलना की दौड़

सोशल मीडिया पर दिखने वाली “परफेक्ट लाइफ” युवाओं को भ्रम में डाल रही है। लोग अपनी उपलब्धियाँ साझा करते हैं, लेकिन संघर्ष नहीं। इससे युवा खुद को कमतर आंकने लगते हैं। आत्मविश्वास में गिरावट और हीनभावना इसी तुलना का परिणाम है।

ऑनलाइन पढ़ाई और करियर का दबाव

ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा दिया है। हर युवा खुद को साबित करने की दौड़ में है। असफलता का डर और भविष्य की चिंता मानसिक थकान (बर्नआउट) को जन्म दे रही है।

जुड़ाव बढ़ा, संवाद घटा

डिजिटल माध्यमों से जुड़ाव बढ़ा है, लेकिन भावनात्मक संवाद घटा है। परिवार और मित्रों के साथ आमने-सामने बातचीत कम हो रही है। इसका परिणाम अकेलापन और भावनात्मक दूरी के रूप में सामने आ रहा है।

मानसिक स्वास्थ्य पर असर

डिजिटल तनाव के कारण युवाओं में चिंता, अवसाद, नींद की समस्या और आत्मसम्मान में कमी जैसी दिक्कतें बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते जागरूकता नहीं बढ़ाई गई, तो यह सामाजिक स्तर की गंभीर समस्या बन सकती है।

समाधान में संतुलन ज़रूरी

डिजिटल दुनिया से दूरी बनाना संभव नहीं है, लेकिन संतुलन ज़रूरी है।

सीमित स्क्रीन टाइम

मोबाइल से नियमित ब्रेक

परिवार से संवाद

योग, ध्यान और शारीरिक गतिविधि

आवश्यकता होने पर काउंसलिंग

ये उपाय युवाओं को मानसिक रूप से मजबूत बना सकते हैं।

निष्कर्ष

तकनीक समस्या नहीं है, समस्या उसका अत्यधिक और असंतुलित उपयोग है। यदि युवा अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें, तो डिजिटल युग तनाव नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का माध्यम बन सकता है।

✍️ लेखक:

मिथलेश रत्नाकर

साइकोलॉजिस्ट एवं सर्टिफाइड मैरिज काउंसलर

बलौदाबाजार, छत्तीसगढ़