रायपुर – अगर छत्तीसगढ़ सरकार के स्मार्ट सिटी के दावों की असली तस्वीर देखनी हो, तो राजधानी रायपुर के भाटागांव पहुंच जाइए। यहां विकास नहीं, बदहाली चीख रही है, यहां स्मार्ट सिटी नहीं बल्कि सरकारी नाकामी और भ्रष्टाचार की खुली प्रदर्शनी चल रही है।

धूल में तब्दील सड़कें, सांस लेना बना सजा

भाटागांव बस स्टैंड के आसपास सड़कें इस कदर बदहाल हैं कि चलना तो दूर, खड़े रहना मुश्किल हो गया है। चारों तरफ उड़ते धूल के गुबार, आंखों में जलन, गले में खराश और सांस की गंभीर समस्या—लेकिन प्रशासन को कोई फर्क नहीं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि धूल नियंत्रण के लिए पानी का छिड़काव तक नहीं किया जा रहा, मानो जनता की सेहत की कोई कीमत ही न हो।


6 महीने पहले ठेका, सड़क अब तक गायब

स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। उनका साफ कहना है कि करीब 6 महीने पहले सड़क निर्माण का ठेका दिया गया, लेकिन आज तक सड़क बनना तो दूर, काम की रफ्तार घोंघे से भी धीमी है। जहां-तहां अधूरा काम, उखड़ी मिट्टी और घटिया गुणवत्ता—यह विकास नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की नींव है।

लोगों के मन में अब सवाल आ रहा है कि क्या अधिकारी और ठेकेदार के बीच कमीशन का “सेट” नहीं हो पाया? इसी वजह से जानबूझकर काम लटकाया जा रहा है?

नया रायपुर में दिखावा, पुराने रायपुर में सजा

एक तरफ नया रायपुर में चमचमाती सड़कों को खोद-खोद कर पेजवर्क किया जा रहा है, जिसे लोग खुला भ्रष्टाचार बता रहे हैं। दूसरी तरफ पुराने रायपुर में ज़रूरी सड़कें तक नहीं बन पा रही हैं। यह कैसा दोहरा मापदंड है? यह कैसा स्मार्ट सिटी मॉडल है, जहां जहां जरूरत है वहां अंधेरा, और जहां जरूरत नहीं वहां बर्बादी पर बर्बादी?


स्मार्ट सिटी या स्मार्ट लूट?

भाटागांव की हालत साफ बता रही है कि स्मार्ट सिटी सिर्फ पोस्टर, फाइलों और भाषणों में जिंदा है। जमीनी हकीकत में जनता को मिल रहा है—धूल, गड्ढे, बीमारी और अपमान।