बलौदाबाजार। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, जिसे भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का सबसे बड़ा हथियार माना जाता है, बलौदाबाजार में अफसरों की लापरवाही की भेंट चढ़ता दिख रहा है। एक अपीलार्थी को 4 साल तक फाइल के पीछे दौड़ाने और आयोग के नोटिसों को ठेंगे पर रखने वाले अफसरों पर अब तक धारा 20(1) के तहत 25,000 रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना न लगना, प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। 

​अपीलार्थी राजकुमारी विश्नोई ने 25 मई 2021 को तहसीलदार बलौदाबाजार से ग्राम चांपा के रिनंबरिंग पंजी और बंदोबस्त मिसल की प्रतियां मांगी थीं।

  • नतीजा शून्य: न तहसीलदार (जन सूचना अधिकारी) ने जानकारी दी, न एसडीएम (प्रथम अपीलीय अधिकारी) ने सुनवाई की।
  • आयोग की अवहेलना: द्वितीय अपील में राज्य सूचना आयोग ने 2022 से 2025 के बीच 5 बार नोटिस जारी किए, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी न तो खुद पेश हुए और न ही कोई लिखित जवाब भेजा।

​आयोग की ‘सख्त’ टिप्पणी, पर कार्रवाई में ‘नरमी’?

​राज्य सूचना आयुक्त आलोक चन्द्रवंशी ने इस मामले में कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए माना कि अधिकारियों के इस रवैये से शासन की छवि धूमिल हो रही है। आयोग ने धारा 20(2) के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा तो की है, लेकिन कानून के जानकारों का सवाल है कि धारा 20(1) के तहत सीधे दंड क्यों नहीं दिया गया?

क्या कहता है RTI कानून ?

यदि जन सूचना अधिकारी बिना किसी वाजिब कारण के जानकारी नहीं देता या प्रक्रिया में बाधा डालता है, तो आयोग पर यह दायित्व है कि वह 250 रुपये प्रतिदिन (अधिकतम 25,000 रुपये) का जुर्माना आरोपित करे।

​जनता के 5 सुलगते सवाल:

  1. पहचान का संकट या बचाव की कोशिश? क्या आयोग यह पता लगाने में असमर्थ रहा कि 2021 से 2024 के बीच संबंधित पदों पर कौन पदस्थ था?
  2. कलेक्टर के आदेश की अनदेखी: जब कलेक्टर के माध्यम से तामील नोटिस का भी पालन प्रतिवेदन नहीं मिला, तो क्या यह सीधे तौर पर “कंटेंप्ट” (अवमानना) का मामला नहीं है?
  3. सिर्फ कागजी खानापूर्ति? अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा अक्सर फाइलों में दबकर रह जाती है, जबकि वेतन से कटने वाला जुर्माना सीधे जवाबदेही तय करता है। अफसरों को ‘आर्थिक चोट’ से क्यों बचाया जा रहा है?
  4. 4 साल का मानसिक कष्ट: अपीलार्थी को चार साल बाद भी जानकारी नहीं मिली। इस देरी और मानसिक प्रताड़ना का जिम्मेदार कौन?
  5. मुख्य सचिव को पत्र, पर असर कब? आयोग ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर विभाग प्रमुखों को निर्देश देने को कहा है, लेकिन क्या पुराने दोषियों को सजा दिए बिना नए लोग सुधरेंगे?
  6. कानून की धार कुंद कर रही ‘अफसरशाही’

​यह मामला साबित करता है कि यदि रक्षक ही भक्षक बन जाएं और कानून की व्याख्या करने वाली संस्थाएं कड़े आर्थिक दंड देने से हिचकिचाएं, तो RTI कानून सिर्फ एक “शोपीस” बनकर रह जाएगा। बलौदाबाजार का यह प्रकरण अब शासन की नीयत पर सवाल खड़ा कर रहा है।

अब देखना होगा कि क्या मुख्य सचिव इस मामले में कोई मिसाल कायम करते हैं या फिर ‘फाइल’ एक बार फिर ठंडे बस्ते में चली जाएगी।