रायपुर – छत्तीसगढ़ में नौकरशाही की रीढ़ मानी जाने वाली IAS-IPS सेवा को लेकर सनसनीखेज आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि राज्य में संवैधानिक संस्थाओं, नियम-कायदों और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन को खुलेआम ठेंगा दिखाते हुए IAS-IPS के पद “रेवड़ियों की तरह” बांटे जा रहे हैं।
आरोपों के मुताबिक, डबल इंजन सरकार के दौर में योग्यता, उम्र, चयन प्रक्रिया और CGPSC-UPSC जैसी संवैधानिक परीक्षाएं बेमानी होती जा रही हैं। बस आपके पास “जुगाड़” होना चाहिए—फिर न छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की जरूरत, न चयन की बाध्यता; संघ लोक सेवा आयोग मानो घर बैठे “सेवाएं” देने को तैयार है।
अनुकंपा की आड़ में IAS-IPS अवॉर्ड का खेल!
राज्य की भारतीय जनता पार्टी सरकार पर गंभीर आरोप हैं कि “अनुकंपा नियुक्ति” की आड़ में IAS-IPS जैसा संवैधानिक अवॉर्ड बांटने का गोरखधंधा चल रहा है—जो प्रशासनिक गलियारों से लेकर राजनीतिक हलकों तक सुर्खियों में है।
सूत्रों के मुताबिक, भले ही कोई अभ्यर्थी CGPSC से सिलेक्ट न हो, फिर भी उसे UPSC के रास्ते IAS बना दिया जा रहा है। इतना ही नहीं, पिछले दरवाजे से मिले अवॉर्ड वाले अफसरों को शासन-प्रशासन पर बेरोक-टोक थोपा जा रहा है।
सौमिल रंजन चौबे प्रकरण: IAS अवॉर्ड पर सवालों का तूफान
इसी कड़ी में सौमिल रंजन चौबे का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। प्रशासनिक हलकों से ही उनके IAS अवॉर्ड को रद्द करने की मांग उठ रही है।
गंभीर सवाल
क्या सौमिल रंजन चौबे CGPSC से चयनित नहीं हैं?
क्या CGPSC ने डिप्टी कलेक्टर से IAS अवॉर्ड हेतु उनका अनुमोदन कभी दिया ही नहीं?
क्या महत्वपूर्ण तथ्यों को UPSC और DoPT से छिपाया गया?
सूत्रों का दावा है कि CGPSC के मौजूदा अधिकारी (नाम गोपनीय) मानते हैं कि IAS अवॉर्ड के लिए उनका अनुमोदन नहीं किया गया। यह भी कहा जा रहा है कि पूर्व में CGPSC की भूमिका की फाइलें खंगाले बिना सच्चाई सामने नहीं आएगी—जो खुद में “दाल में कुछ काला” होने की ओर इशारा करता है।
उम्र, नियम और सुप्रीम कोर्ट—सब रद्दी की टोकरी में?
जानकारी के अनुसार, जुलाई 2009 में पिता विनोद चौबे के निधन के समय सौमिल रंजन चौबे की उम्र 21 वर्ष से कम थी, जबकि डिप्टी कलेक्टर पद के लिए न्यूनतम उम्र 21 वर्ष निर्धारित है। यही नहीं, जब अनुकंपा नियुक्ति के नियम शिथिल कर उन्हें डिप्टी कलेक्टर बनाए जाने की कोशिश हुई, तब GAD ने कैबिनेट नोट में इसे कानूनन अनुचित बताया और आपत्ति दर्ज की—नतीजतन नियुक्ति टल गई। लेकिन कुछ महीनों बाद नया कैबिनेट नोट लाकर उसी नियुक्ति को हरी झंडी दे दी गई। इस पूरे प्रकरण में CGPSC के अनुमोदन के बिना नियुक्ति का आरोप है। अब “दोहरा कैबिनेट नोट” सवालों के घेरे में है।
सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट गाइडलाइन की अनदेखी
सुप्रीम कोर्ट बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि अनुकंपा नियुक्ति में
मृत अधिकारी के पद-स्टेटस के आधार पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती,
राजपत्रित अधिकारी के पद अनुकंपा के तहत भरना सिद्धांततः गलत है,
योग्यता/पद देखकर भी राजपत्रित पद पर सीधी अनुकंपा अवैध मानी गई है।
इसके बावजूद, आरोप है कि छत्तीसगढ़ में नियमों की गलत व्याख्या कर डिप्टी कलेक्टर, DSP जैसे संवर्ग-2 के राजपत्रित पद सहानुभूति के नाम पर बांटे गए—जो सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट की भावना के खिलाफ है।
UPSC-DoPT से तथ्य छिपाने का आरोप
जानकारों का दावा है कि IAS-IPS अवॉर्ड के दौरान अभ्यर्थियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां जानबूझकर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग और UPSC से छिपाई गईं, ताकि मनपसंद अफसरों को पिछले दरवाजे से IAS-IPS दिलाया जा सके।




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