कांकेर/,पखांजुर – आजादी के 78-79 साल बीत जाने के बाद भी अगर कोई गांव बिजली, पानी, सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा हो, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्था की बड़ी विफलता है। कांकेर जिले के पखांजुर क्षेत्र से सामने आई बंडा गांव की तस्वीर सरकार के “अमृतकाल” और “विकास” के दावों की पोल खोल रही है।
एक तरफ केंद्र सरकार देश को अमृतकाल में प्रवेश कर चुका बताती है, तो दूसरी तरफ राज्य सरकार “हमने बनाया है, हम ही संवारेंगे” जैसे बड़े-बड़े दावे करती है। लेकिन हकीकत यह है कि ये दावे सिर्फ पोस्टर, भाषण और दीवारों तक ही सीमित हैं। जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है।
28 परिवार, 80 लोग… और सुविधाएं शून्य
कोयलीबेड़ा ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत इरूकबुट्टा का आश्रित ग्राम बंडा आज भी विकास से कोसों दूर है। गांव में करीब 27-28 परिवार रहते हैं, जिनकी कुल आबादी 70 से 80 के बीच है। लेकिन इतने वर्षों में भी यह गांव सरकारी योजनाओं की रोशनी तक नहीं देख पाया।
यहां के लोग आज भी झरिया (प्राकृतिक जल स्रोत) के पानी पर निर्भर हैं। बरसात हो, कड़ाके की ठंड हो या भीषण गर्मी—हर मौसम में यही पानी उनकी जिंदगी का सहारा है। सवाल उठता है कि जब सरकार हर घर नल जल योजना की बात करती है, तो फिर बंडा गांव इससे क्यों अछूता है?
बिजली नहीं… अंधेरे में गुजर रही जिंदगी
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आजादी के इतने साल बाद भी बंडा गांव में बिजली नहीं पहुंची है। जब देश डिजिटल इंडिया की बात कर रहा है, तब इस गांव के लोग अब भी अंधेरे में जीवन जीने को मजबूर हैं।
बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाते, महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं, और ग्रामीणों का जीवन पूरी तरह पिछड़ा हुआ है। क्या यही है सरकार का “सशक्त भारत” का सपना?
स्कूल और आंगनबाड़ी का अभाव, बच्चों का भविष्य अंधकार में
बंडा गांव में न तो कोई स्कूल है और न ही आंगनबाड़ी केंद्र। छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा और पोषण से वंचित रहना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल सरकारी योजनाओं की विफलता को दिखाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है।
जब देश में नई शिक्षा नीति लागू हो रही है, तब बंडा गांव के बच्चों के पास पढ़ने के लिए एक छत तक नहीं है। क्या यह बच्चों के अधिकारों का खुला उल्लंघन नहीं है?
4 किलोमीटर पैदल… तब मिलता है राशन
राशन जैसी मूलभूत सुविधा के लिए भी बंडा गांव के लोगों को 4 किलोमीटर का कठिन सफर तय करना पड़ता है। पगडंडी रास्तों से गुजरते हुए, कई बार बारिश और जंगल के खतरे झेलते हुए ग्रामीण राशन लेने जाते हैं।
क्या सरकार की जन वितरण प्रणाली (PDS) सिर्फ कागजों में ही चल रही है?
स्वास्थ्य सेवा शून्य, जान जोखिम में
गांव में किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं है। बीमार होने पर ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, जो कई बार जानलेवा साबित होता है। गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है।
सरकार जहां आयुष्मान भारत और ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की बात करती है, वहीं बंडा गांव इन योजनाओं से पूरी तरह कट चुका है।
सड़क नहीं… पगडंडी ही सहारा
बंडा गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। लोग आज भी पगडंडी या साइकिल के सहारे गांव तक पहुंचते हैं। बारिश के समय यह रास्ता और भी खतरनाक हो जाता है, जिससे गांव पूरी तरह कट जाता है।
जब देश में हाईवे और एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, तब एक गांव तक सड़क न पहुंच पाना किसकी नाकामी है?
जनप्रतिनिधियों से गुहार… सिर्फ आश्वासन
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार विधायक और सांसद से अपनी समस्याएं बताई हैं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। कोई ठोस कार्रवाई आज तक नहीं हुई।
यह स्थिति दिखाती है कि चुनाव के समय वोट मांगने वाले जनप्रतिनिधि, चुनाव के बाद इन आदिवासी ग्रामीणों को पूरी तरह भूल जाते हैं।
सरकार के दावे बनाम हकीकत
हर घर जल – बंडा में नहीं
हर घर बिजली – बंडा में नहीं
शिक्षा का अधिकार – बंडा में नहीं
स्वास्थ्य सेवा – बंडा में नहीं
सड़क कनेक्टिविटी – बंडा में नहीं
तो आखिर ये योजनाएं जा कहां रही हैं?
बड़ा सवाल: क्या बंडा गांव को मिलेगा हक?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस खबर के प्रकाशित होने के बाद क्या सरकार जागेगी? क्या बंडा गांव तक बिजली, पानी, सड़क और शिक्षा पहुंचेगी? या फिर यह गांव भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
बंडा गांव की यह स्थिति सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है। अगर अब भी जिम्मेदार नहीं जागे, तो “अमृतकाल” जैसे शब्द सिर्फ एक मजाक बनकर रह जाएंगे।
बंडा गांव आज भी विकास की रोशनी का इंतजार कर रहा है। सवाल यह है कि क्या सरकार इन आदिवासी ग्रामीणों की जिंदगी में उजाला लाएगी, या फिर उन्हें यूं ही अंधेरे में जीने के लिए छोड़ देगी?
अब नजर इस बात पर है कि खबर के बाद प्रशासन और सरकार क्या कदम उठाती है—मुस्कान आएगी या मायूसी ही किस्मत बनी रहेगी।http://srijanbhoominews.in







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