छत्तीसगढ़ – राजधानी रायपुर के माना केंद्रीय रोपणी वन विभाग से जुड़ा एक बड़ा घोटाला अब खुलकर सामने आ रहा है। श्री कुँवारा देव महिला स्व-सहायता समूह के संचालन और उससे जुड़े वित्तीय लेन-देन को लेकर विधानसभा में दी गई गलत जानकारी ने पूरे सिस्टम की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जांच में दोषी पाए जाने के बावजूद तत्कालीन वनमंडलाधिकारी (DFO) लोकनाथ पटेल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जबकि निचले स्तर के कर्मचारियों को सस्पेंड कर पूरे मामले को दबाने की कोशिश की गई।
दरअसल, विधानसभा के तारांकित प्रश्न क्रमांक 1254 के जवाब में विभाग द्वारा जो जानकारी दी गई, वह जांच में पूरी तरह भ्रामक और तथ्य छुपाने वाली पाई गई। जांच प्रतिवेदन में साफ तौर पर उल्लेख है कि श्री कुँवारा देव महिला स्व-सहायता समूह के संचालन को लेकर जो जानकारी प्रस्तुत की गई, वह वास्तविकता से मेल नहीं खाती। इस गंभीर लापरवाही के लिए विभाग के कई अधिकारी-कर्मचारियों को जिम्मेदार माना गया, जिनमें प्रमुख नाम DFO लोकनाथ पटेल का है।


लेकिन यहीं से शुरू होता है “सेटिंग” का खेल…

जांच रिपोर्ट में साफ तौर पर DFO लोकनाथ पटेल को जिम्मेदार बताया गया, बावजूद इसके उनके खिलाफ न तो कोई निलंबन हुआ, न विभागीय कार्रवाई। इसके उलट, कुछ सहायक ग्रेड कर्मचारियों और फील्ड स्टाफ को निलंबित कर दिया गया। यानी बड़े अफसर को बचाने के लिए छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बना दिया गया।

सूत्रों की मानें तो DFO लोकनाथ पटेल खुद को छत्तीसगढ़ सरकार के एक कैबिनेट मंत्री का करीबी रिश्तेदार बताते हैं। यही वजह है कि इतने बड़े मामले में भी उन पर कार्रवाई करने से अधिकारी कतराते नजर आ रहे हैं। अगर यह दावा सही है, तो यह न केवल प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल है, बल्कि पूरे सिस्टम में राजनीतिक संरक्षण की गहरी पैठ को भी उजागर करता है।

करोड़ों के घोटाले का आरोप

मामला सिर्फ गलत जानकारी देने तक सीमित नहीं है। श्री कुँवारा देव महिला स्व-सहायता समूह के माध्यम से करोड़ों रुपये के गड़बड़ी और वित्तीय अनियमितताओं का आरोप भी सामने आया है। जांच दस्तावेजों के अनुसार, समूह के संचालन, फंड ट्रांसफर, भुगतान और कार्यों में गंभीर गड़बड़ियां पाई गई हैं।

जांच में यह भी सामने आया कि कई दस्तावेज या तो गायब थे या फिर अधूरे प्रस्तुत किए गए। बैंक स्टेटमेंट, भुगतान की रसीदें और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड में भारी असंगतियां मिली हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर सुनियोजित भ्रष्टाचार?

विधानसभा का अपमान, लोकतंत्र पर चोट

सबसे गंभीर पहलू यह है कि गलत जानकारी सीधे विधानसभा में दी गई। यह न केवल जनप्रतिनिधियों को गुमराह करने का मामला है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी अपमान है। अगर अधिकारी ही सदन में गलत तथ्य पेश करेंगे, तो जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा?
जांच रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि इस कृत्य से विधानसभा के विशेषाधिकार का हनन हुआ है। बावजूद इसके मुख्य जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होना, पूरे सिस्टम पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

“ऊपर से दबाव” या अंदरूनी सांठगांठ?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या DFO लोकनाथ पटेल को बचाने के लिए ऊपर से दबाव है? या फिर विभाग के भीतर ही एक मजबूत लॉबी उन्हें संरक्षण दे रही है? क्योंकि जिस तरह से जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी उन्हें क्लीन चिट जैसा व्यवहार मिला, वह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं मानी जा सकती।

जनता और विपक्ष के निशाने पर सरकार

यह मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर हो सकता है। वहीं आम जनता भी यह सवाल पूछ रही है कि जब छोटे कर्मचारी सस्पेंड हो सकते हैं, तो बड़े अफसर क्यों नहीं?

क्या होगी कार्रवाई या फिर दब जाएगा मामला?

रायपुर के माना रोपणी का यह मामला अब सिर्फ एक विभागीय गड़बड़ी नहीं, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। अगर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह साफ संकेत होगा कि सत्ता और सिस्टम के गठजोड़ के आगे नियम-कानून बौने पड़ चुके हैं।

अब देखना होगा कि सरकार इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई करती है या फिर यह फाइल भी “ठंडे बस्ते” में डाल दी जाएगी।